समाधान भारत शिमला। शिमला को रोशन करने वाले हिमाचल के ऐतिहासिक चाबा पावर हाउस पर अब लगातार बढ़ते जलस्तर और बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। करीब 113 साल पुराने इस बिजलीघर की सुरक्षा को लेकर सरकार और बिजली बोर्ड गंभीर हो गए हैं। सतलुज नदी में बार-बार बढ़ते जलस्तर के कारण चाबा पावर हाउस को नुकसान पहुंचने की आशंका लगातार बनी हुई है। ऐसे में अब इसे मौजूदा स्थान से किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट करने की तैयारी शुरू कर दी गई है।
अंग्रेजी शासन के दौरान वर्ष 1913-14 में स्थापित किया गया चाबा पावर हाउस हिमाचल के सबसे पुराने चालू जलविद्युत संयंत्रों में शामिल है। जब देश में बड़े बिजली संयंत्रों का दौर शुरू नहीं हुआ था, उस समय चाबा पावर हाउस से शिमला शहर को बिजली उपलब्ध कराई जा रही थी। उस दौर में शिमला ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी था और शहर में बिजली की बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए इस परियोजना को स्थापित किया गया था।
आज भी चाबा पावर हाउस बिजली उत्पादन कर रहा है। इसकी स्थापित क्षमता 1.75 मेगावाट है। परियोजना में 0.50-0.50 मेगावाट की दो इकाइयां और 0.25-0.25 मेगावाट की तीन इकाइयां हैं। यह रन-ऑफ-द-रिवर श्रेणी की जलविद्युत परियोजना है। चाबा पावर हाउस में बिजली उत्पादन के लिए चाबा क्षेत्र में सतलुज की सहायक धारा नोटी खड्ड के पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
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लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नदी के जलस्तर में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव ने चाबा पावर हाउस की सुरक्षा को चुनौती दी है। खासकर सतलुज नदी में बाढ़ जैसी स्थिति बनने के दौरान बिजलीघर के आसपास खतरा बढ़ जाता है। बिजली बोर्ड के अनुसार, कोल डैम के निर्माण के बाद पानी के स्तर में बदलाव आया है और इसका असर चाबा पावर हाउस पर भी पड़ा है।
इतिहास में भी इस बिजलीघर को बाढ़ का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2000 में आई भीषण बाढ़ के दौरान चाबा पावर हाउस को व्यापक नुकसान हुआ था। बाढ़ के कारण यहां बिजली उत्पादन बंद करना पड़ा था। इसके बाद परियोजना को दोबारा बहाल कर चालू किया गया। वर्ष 2019 में भी बाढ़ की वजह से चाबा पावर हाउस प्रभावित हुआ था।
113 साल पुराना चाबा पावर हाउस बाढ़ की जद में, सुरक्षित जगह शिफ्ट करने की तैयारी
वर्ष 2022 में स्थिति और गंभीर हो गई थी। उस दौरान सतलुज नदी का पानी चाबा पावर हाउस के अंदर तक पहुंच गया था। पानी भरने के कारण टर्बाइन कई दिनों तक पानी में डूबी रहीं। इस घटना के बाद परियोजना की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई। लगातार सामने आ रही ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए अब चाबा पावर हाउस को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से भी परियोजना को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की सलाह दी गई है। अधिकारियों का मानना है कि सरकारी संपत्ति को बार-बार होने वाले नुकसान से बचाने के लिए स्थायी समाधान जरूरी है। इसी दिशा में सरकार और बिजली बोर्ड के स्तर पर चाबा पावर हाउस की शिफ्टिंग को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
बिजली बोर्ड ने चाबा पावर हाउस को स्थानांतरित करने का मामला एनटीपीसी और केंद्र सरकार के समक्ष भी उठाया है। बोर्ड की ओर से यह बताया गया है कि कोल डैम के निर्माण के बाद सतलुज में पानी के स्तर से जुड़ी परिस्थितियों में बदलाव आया है। ऐसे में चाबा पावर हाउस की मौजूदा लोकेशन को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ी हैं।
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बिजली बोर्ड के एमडी आदित्य नेगी के अनुसार, चाबा पावर हाउस को शिफ्ट करने का मामला एनटीपीसी और केंद्र सरकार के साथ उठाया गया है। इसका उद्देश्य केवल बिजलीघर को सुरक्षित करना नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और सरकारी संपत्ति को भविष्य में होने वाले नुकसान से बचाना भी है।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष दीपक राठौर ने भी कहा है कि पिछले करीब तीन वर्षों से सतलुज नदी का जलस्तर बढ़ रहा है। ऐसे में सरकारी संपत्ति को नुकसान से बचाने के लिए संबंधित विभागों के साथ समय-समय पर विचार-विमर्श किया जाता रहा है। उनका कहना है कि जानमाल के नुकसान की आशंका को देखते हुए उचित कदम उठाए जा रहे हैं।
चाबा पावर हाउस केवल एक बिजली परियोजना नहीं, बल्कि हिमाचल के बिजली उत्पादन के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। वर्ष 1913 में इसकी स्थापना उस समय हुई थी, जब आधुनिक बिजली व्यवस्था आज की तरह विकसित नहीं थी। शिमला की बिजली जरूरतों को पूरा करने में चाबा पावर हाउस ने शुरुआती दौर से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज इस परियोजना से पैदा होने वाली बिजली ग्रिड में जाती है और शिमला शहर के एक हिस्से सहित आसपास के क्षेत्रों की जरूरत पूरी करने में योगदान देती है। इसलिए चाबा पावर हाउस को सुरक्षित रखना बिजली आपूर्ति के साथ-साथ ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चाबा पावर हाउस को किस स्थान पर और किस तकनीकी व्यवस्था के तहत शिफ्ट किया जाएगा। सरकार, बिजली बोर्ड, एनटीपीसी और केंद्र सरकार के बीच होने वाली बातचीत के बाद इसकी तस्वीर साफ होगी। अगर शिफ्टिंग का फैसला आगे बढ़ता है तो 113 साल पुराने चाबा पावर हाउस को बाढ़ के खतरे से सुरक्षित करने की दिशा में यह बड़ा कदम होगा।
लगातार बढ़ते जलस्तर और अतीत में बाढ़ से हुए नुकसान को देखते हुए चाबा पावर हाउस की सुरक्षा अब प्राथमिकता बन गई है। आने वाले समय में इस ऐतिहासिक बिजलीघर को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की योजना किस तरह आकार लेती है, इस पर सभी की नजर रहेगी।



