समाधान भारत शिमला:- हिमाचल प्रदेश में राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को बंद किए जाने के मुद्दे ने प्रदेश की राजनीति और वित्तीय स्थिति दोनों को एक साथ केंद्र में ला दिया है। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद केंद्र सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2026 से आरडीजी समाप्त करने के निर्णय के विरोध में प्रदेश सरकार ने व्यापक चर्चा और रणनीति तैयार करने के लिए शिमला स्थित राज्य सचिवालय में सर्वदलीय बैठक बुलाई है। यह बैठक सुबह 11 बजे आयोजित होगी और इसमें सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है। संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन चौहान की ओर से भाजपा, माकपा और अन्य दलों को औपचारिक पत्र भेजकर बैठक में शामिल होने का आग्रह किया गया है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू स्वयं बैठक की अध्यक्षता करेंगे। बैठक में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष राजीव बिंदल, माकपा नेता संजय चौहान और राकेश सिंघा सहित कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के शामिल होने की संभावना है। सरकार का कहना है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि प्रदेश के आर्थिक भविष्य से जुड़ा हुआ है, इसलिए सभी दलों को एक मंच पर आकर साझा रणनीति बनानी चाहिए। प्रदेश सरकार के अनुसार आरडीजी हिमाचल जैसे विशेष श्रेणी राज्य के लिए वित्तीय संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन रहा है। पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और उच्च विकास लागत के कारण राज्य लंबे समय से इस अनुदान पर निर्भर रहा है। यदि यह अनुदान बंद होता है तो अगले पांच वर्षों में लगभग 50 हजार करोड़ रुपये के संभावित नुकसान का अनुमान लगाया गया है। इससे विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे के निर्माण, स्वास्थ्य और शिक्षा योजनाओं के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर भी सीधा असर पड़ सकता है।
सरकार का यह भी कहना है कि आरडीजी बंद होने से राज्य की राजकोषीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा, जिससे कर्ज का बोझ बढ़ सकता है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में राज्य को वैकल्पिक संसाधन जुटाने, राजस्व बढ़ाने और खर्चों में संतुलन बनाने के लिए नई नीतियां बनानी होंगी। हालांकि, सरकार फिलहाल केंद्र से इस निर्णय पर पुनर्विचार की मांग करने की रणनीति तैयार कर रही है। इससे पहले सरकार ने विधायक दल की बैठक भी बुलाई थी, लेकिन भाजपा विधायकों ने उसमें भाग नहीं लिया। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की अनुपस्थिति भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी रही। अब सर्वदलीय बैठक के माध्यम से सरकार व्यापक सहमति बनाने का प्रयास कर रही है ताकि केंद्र सरकार के समक्ष प्रदेश का पक्ष एकजुट होकर रखा जा सके। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बैठक केवल औपचारिकता नहीं बल्कि प्रदेश के आर्थिक भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। यदि सभी दल एकजुट होकर रणनीति बनाते हैं तो केंद्र पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन यदि मतभेद बरकरार रहे तो प्रदेश को वित्तीय चुनौतियों का अकेले सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, प्रदेश की जनता की निगाहें शिमला में होने वाली इस अहम सर्वदलीय बैठक पर टिकी हैं, जहां से राज्य के वित्तीय भविष्य की दिशा तय हो सकती है।



