समाधान भारत शिमला:- अमेरिका द्वारा भारतीय दवा उद्योग पर 18 प्रतिशत टैरिफ लागू करने की घोषणा के बाद जहां देश के फार्मा सेक्टर में चर्चा तेज हो गई है, वहीं हिमाचल प्रदेश के दवा उद्योग को इससे किसी बड़े नुकसान की आशंका नहीं है। उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार हिमाचल से अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का निर्यात बेहद सीमित है और कुल आपूर्ति में प्रदेश की हिस्सेदारी केवल करीब दो प्रतिशत के आसपास है। इसी कारण अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव हिमाचल की फार्मा इकाइयों पर नहीं पड़ रहा है। प्रदेश की अधिकांश दवा इकाइयां घरेलू बाजार या अन्य देशों को दवाओं की आपूर्ति करती हैं। फार्मा उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की कई बड़ी दवा कंपनियां पहले से ही अमेरिका में अपने उत्पादन संयंत्र स्थापित कर चुकी हैं, जिससे वहां की मांग को स्थानीय स्तर पर पूरा किया जा रहा है। हैदराबाद स्थित ओरोबिंदो फार्मा अमेरिका को सबसे अधिक जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करती है, जबकि डॉ. रेड्डी, सन फार्मा, सिपला, लूपिन, टोरेंट, जेड्स, नेटको और मोरकसंस जैसी नामी कंपनियां भी अमेरिका में स्थापित होकर वहीं उत्पादन कर रही हैं। कुल मिलाकर अमेरिका अपनी जरूरत की लगभग 40 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं ही भारत से मंगाता है, जबकि शेष आपूर्ति अन्य स्रोतों या घरेलू उत्पादन से पूरी की जाती है। जानकार बताते हैं कि इससे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान भारतीय दवाओं पर कोई टैरिफ नहीं लगाया गया था। मौजूदा कार्यकाल में हालांकि 50 से 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जाने की अटकलें जरूर सामने आई थीं, लेकिन उस समय फार्मा सेक्टर को इनसे बाहर रखा गया। अब 18 प्रतिशत टैरिफ लागू किए जाने की घोषणा हुई है, लेकिन इसका असर भी सीमित रहने की संभावना जताई जा रही है, खासकर उन राज्यों पर जहां से अमेरिका को दवाओं का निर्यात बहुत कम होता है।
यह भी पढ़े:-https://samadhaanbharat.com/doublehimachadisappears-governmentstolen-by-changingcard/
हिमाचल प्रदेश में केवल एक-दो फार्मा कंपनियां ही सीधे तौर पर अमेरिकी बाजार के लिए जेनेरिक दवाएं तैयार करती हैं। इनमें यूनिकेम कंपनी का नाम प्रमुख रूप से लिया जा रहा है, हालांकि यूनिकेम के उत्पादन संयंत्र हिमाचल के अलावा अन्य राज्यों में भी स्थित हैं। ऐसे में किसी एक राज्य पर निर्भरता न होने के कारण भी टैरिफ का प्रभाव कम माना जा रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि हिमाचल की फार्मा इकाइयां फिलहाल स्थिर स्थिति में हैं और उत्पादन या रोजगार पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है। दवा निर्माता सुरेश गर्ग ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी टैरिफ बढ़ने से हिमाचल के दवा उद्योग पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। वहीं उद्योग संघ के प्रदेश अध्यक्ष चिरंजीव ठाकुर ने बताया कि अमेरिका की ओर से पहले दवाओं पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता था और अब भी इसका प्रभाव प्रदेश के उद्योगों तक सीमित ही रहेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से पहले भी कई घोषणाएं की गई थीं, लेकिन वे व्यवहारिक रूप से लागू नहीं हो सकीं। उधर, हिमाचल के दवा नियंत्रक डॉ. मनीष कपूर ने कहा कि उनका विभाग केवल दवाओं के निर्माण, गुणवत्ता और नियमन से संबंधित कार्य देखता है, जबकि दवाओं के निर्यात और उनके गंतव्य से जुड़ा कोई विस्तृत रिकॉर्ड उनके विभाग के पास उपलब्ध नहीं रहता। कुल मिलाकर, अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी को लेकर बनी आशंकाओं के बीच हिमाचल प्रदेश के फार्मा उद्योग ने फिलहाल राहत की सांस ली है और उद्योग जगत का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में इस फैसले का राज्य के दवा निर्माताओं पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।



