समाधान भारत शिमला हिमाचल प्रदेश में सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य सचिवालय में मंगलवार को हुई कैबिनेट सब-कमेटी की बैठक के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि प्रदेश भर में लगभग एक हजार सरकारी भवन वर्षों से खाली पड़े हैं, जबकि कई सरकारी विभाग आज भी निजी इमारतों में किराये पर अपने कार्यालय चला रहे हैं। इस व्यवस्था के चलते राज्य सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ रहा है, जो सीधे तौर पर राजकोष पर असर डाल रहा है। बैठक की अध्यक्षता कर रहे राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने इस स्थिति पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जहां भी सरकारी भवन उपलब्ध हैं, वहां बिना देरी किए किराये पर चल रहे दफ्तरों को स्थानांतरित किया जाए। उन्होंने कहा कि जब सरकार के पास अपनी संपत्तियां मौजूद हैं, तब निजी भवनों पर भारी किराया देना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह वित्तीय अनुशासन और सुशासन के सिद्धांतों के भी खिलाफ है। मंत्री नेगी ने इसे सरकारी धन की खुली बर्बादी करार दिया। सब-कमेटी के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों में यह भी सामने आया कि कई जिलों और उपमंडलों में विभागों के पास अपने भवन तो हैं, लेकिन वे या तो लंबे समय से अनुपयोगी पड़े हैं या फिर मरम्मत और रखरखाव के अभाव में इस्तेमाल के योग्य नहीं रह गए हैं।
यह भी पढ़े:-https://samadhaanbharat.com/casecyber-fraud-has-comewith-the-promiseesla-modelreward-worth-crores/
दूसरी ओर, वही विभाग निजी भवनों में लाखों रुपये किराये के रूप में खर्च कर रहे हैं। इस विरोधाभासी स्थिति ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। राजस्व मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि खाली पड़े सभी सरकारी भवनों की विभागवार और जिला स्तर पर विस्तृत सूची तैयार की जाए। इसके साथ ही किराये पर चल रहे दफ्तरों को चरणबद्ध तरीके से इन भवनों में शिफ्ट करने के लिए एक समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि जिन भवनों में मरम्मत, बिजली, पानी या अन्य बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता है, वहां प्राथमिकता के आधार पर बजट का प्रावधान सुनिश्चित किया जाए, ताकि उन्हें जल्द उपयोग में लाया जा सके। बैठक में कैबिनेट मंत्री राजेश धर्माणी और यादवेंद्र गोमा भी उपस्थित रहे। सभी मंत्रियों ने एक स्वर में सरकारी संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और अनावश्यक खर्चों में कटौती की आवश्यकता पर बल दिया। मंत्रियों का मानना है कि इस कदम से न केवल राज्य के खजाने पर पड़ने वाला बोझ कम होगा, बल्कि सरकारी कामकाज अधिक सुव्यवस्थित, पारदर्शी और प्रभावी बन सकेगा। इसके साथ ही बैठक में पंचायत चुनाव समय पर न होने के मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त की गई और इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने की बात कही गई।



