Wednesday, February 18, 2026
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हिमाचल के जल प्रबंधन में मील का पत्थर, आईआईटी मंडी ने भूजल जोनिंग पर किया शोध प्रकाशित।

समाधान भारत शिमला हिमाचल प्रदेश में बढ़ते जल संकट के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने ब्यास बेसिन में भूजल की उपलब्धता और भविष्य में संभावित पानी की कमी का एक व्यापक अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिसे राज्य में जल प्रबंधन और नीति निर्धारण के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है। इस शोध के अंतर्गत रिमोट सेंसिंग और जीआईएस आधारित आधुनिक तकनीक का उपयोग कर पूरे ब्यास बेसिन को विभिन्न भूजल जोनों में बांटा गया और एक विस्तृत नक्शा तैयार किया गया। इस नक्शे के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि कौन से क्षेत्र भूजल से समृद्ध हैं और किन क्षेत्रों में आने वाले वर्षों में जल संकट की संभावना अधिक है। शोध के निष्कर्षों के अनुसार पश्चिमी ब्यास बेसिन के इलाके भूजल की दृष्टि से सबसे समृद्ध पाए गए हैं। इसमें कांगड़ा जिला, देहरागोपीपुर, ज्वालामुखी, ज्वाली, नूरपुर, पौंग बांध क्षेत्र और धर्मशाला के निचले क्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों को अत्यधिक और अधिक भूजल उपलब्धता वाले जोन में वर्गीकृत किया गया है। इसका मतलब है कि इन जिलों में न केवल वर्तमान में पानी की पर्याप्त आपूर्ति है, बल्कि भविष्य में जल संकट का खतरा अपेक्षाकृत कम है। मध्य ब्यास बेसिन में स्थिति संतुलित पाई गई है। इसमें मंडी जिला, बल्ह घाटी, सुंदरनगर और जोगिंद्रनगर जैसे क्षेत्र शामिल हैं। शोध के अनुसार इन इलाकों में भूजल की उपलब्धता मध्यम श्रेणी में है। इसका अर्थ है कि वर्तमान में पानी की आपूर्ति संतोषजनक है, लेकिन भविष्य में जल संरक्षण और प्रबंधन के उपायों पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी।

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पूर्वी ब्यास बेसिन के पर्वतीय क्षेत्र, जिनमें कुल्लू, मनाली, बंजार, आनी, ऊपरी मंडी के पहाड़ी इलाके और रोहतांग दर्रे के आसपास के हिमालयी क्षेत्र शामिल हैं, भूजल की दृष्टि से चिंताजनक स्थिति में पाए गए हैं। इन क्षेत्रों को कम और बेहद कम भूजल उपलब्धता वाले जोन में रखा गया है। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि इन क्षेत्रों में आने वाले वर्षों में जल संकट और गहराने की आशंका है। इन इलाकों में भूजल का संरक्षण और वर्षा जल संचयन जैसी योजनाओं को प्राथमिकता देने की सख्त आवश्यकता है। यह अध्ययन आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग द्वारा किया गया और इसे फैकल्टी सदस्य डेरिक्स पी. शुक्ला, दीपक स्वामी और शोधार्थी उत्सव राजपूत ने अंजाम दिया। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल “एनवायरनमेंटल अर्थ साइंसेज” में प्रकाशित किया गया। इस अध्ययन के तहत वर्ष 2022 के लिए ब्यास बेसिन का भूजल उपलब्धता नक्शा तैयार किया गया, जो पूरे बेसिन को भूजल की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग जोन में वर्गीकृत करता है। शोध में वर्ष 2012 से 2021 तक के दस वर्षों के वर्षा आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। इसके अलावा भूमि उपयोग, ढाल, ऊंचाई, भूविज्ञान, मिट्टी की बनावट, ड्रेनेज डेंसिटी और अन्य महत्वपूर्ण कारकों का भी समेकित अध्ययन किया गया। इन सभी कारकों के संयुक्त विश्लेषण से भूजल की वास्तविक स्थिति और भविष्य में संभावित जल संकट की स्थिति का वैज्ञानिक अनुमान लगाया गया। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन केवल हिमाचल प्रदेश ही नहीं बल्कि अन्य पर्वतीय और नदी बेसिन क्षेत्रों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। नीति निर्माता, जल संरक्षण योजनाकार और स्थानीय प्रशासन इस नक्शे की मदद से यह तय कर सकते हैं कि किन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता अधिक है, किन क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति सीमित है और किन क्षेत्रों में जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन जैसी योजनाओं को तत्काल लागू करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस शोध का सबसे बड़ा योगदान यह है कि अब जल संकट से निपटने के लिए अंधेरे में तीर चलाने की जरूरत नहीं रहेगी। वैज्ञानिक और नीति निर्माता अब भूजल आधारित निर्णय लेने के लिए सटीक और वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार, यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश में जल संसाधनों के दीर्घकालिक प्रबंधन, जल संकट की पूर्व चेतावनी और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

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